1. जो भाव अपने स्वामी द्वारा दृष्ट हो तथा उस भाव पर शुभ दृष्टि भी हो तो स्वामी द्वारा दृष्ट भाव की बहुत वृद्धि होती है।

2. जब किसी शुभ भाव (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम) का स्वामी नीच राशि में पड़ा हो, परन्तु उसको नीच भंग प्राप्त हो तो नीचता के भंग का फल उस भाव के लिए जिसका कि वह नीच ग्रह स्वामी है अतीव शुभ होता है।

3. सुख – यदि चतुर्थ भाव उसका स्वामी तथा गुरु तीनों पाप प्रभाव में हों तो मनुष्य जीवन में बहुत दुख भोगता है क्योंकि सुख के द्योतक सभी अंगों को हानि पहुंचती है। इसके विपरीत यदि यही तीनों अंग शुभ प्रभाव में हों तो मनुष्य का जीवन सुख शान्ति तथा आराम से व्यतीत होता है ।

4. स्वार्थपरायणता – यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थेश तथा चन्द्र पर राहु-शनि का प्रभाव हो और अन्य शुभ प्रभाव न हों तो मनुष्य स्वार्थपरायण होता है।

5. विद्या सम्बन्धी प्रश्नों का विवेचन – पंचम भाव का बुद्धि से सम्बन्ध होने के कारण विद्या सम्बन्धी प्रश्नों का विवेचन पंचम भाव, उसके स्वामी तथा विद्या कारक बुध द्वारा भी किया जाना चाहिए। इन तीनों में से जितने अंग अधिक बली तथा शुभदृष्ट होंगे उतनी ही अधिक विद्या मनुष्य को प्राप्त होगी ।

शनि काला होने से अंधेरा पसन्द करता है। अतः यह ग्रह विद्या (Education) नहीं चाहता। जब इसकी दृष्टि द्वितीय भाव, द्वितीयेश, पंचम भाव, पंचमेश अथवा बुध पर हो तो अल्पविद्या तथा विघ्नयुक्त विद्या कहनी चाहिए ।

मंगल की पंचम भाव अथवा पंचमेश पर दृष्टि विद्या पढ़ने की शक्ति को बढ़ाती है, कम नहीं करती, क्योंकि मंगल एक ऊहापोह (Logic) प्रिय ग्रह है ।

6. प्रतियोगिता की परीक्षाएं – पंचम भाव चूंकि बुद्धि से सम्बन्ध रखता है । अतः प्रतियोगिता की परीक्षाएं (Competitive Exams.) जैसे- एस. ए. एस. (Subordinate Accounts Service Exam.) आदि का विचार इस स्थान से करना चाहिए । भाव, भावाधिपति तथा भावकारक (यहां बुध) का सामान्य नियम यहां भी लागू होता है ।

7. लाटरी से धन – पंचम भाव सट्टे, लाटरी आदि का स्थान भी है । यदि इस स्थान में राहु अथवा केतु स्थित हों और पंचमेश बलवान होकर शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो लाटरी प्राप्त होने का योग बन जाता है ।

यदि बुध पंचमेश हो तो और भी पक्का योग बन जाता है क्योंकि राहु-केतु की भांति बुध भी सद्यः फलदायक है।

यदि शुभ नवमेश भी इस योग में सम्मिलित हो जाए तो बहुत लाभदायक होता है, क्योंकि नवम भाव भाग्य (Divine Dispensation) का है और लाटरी भी भाग्य का, न कि पुरुषार्थ का, फल है। स्मरण रहे कि नवम से नवम होने के कारण पंचम में भी भाग्य का पर्याप्त अंश है ।

6. रोग कारक – छठा भाव रोग का है। उधर शनि और राहु दो ग्रह रोग कारक (Significators of Disease) माने गए हैं। अतः स्पष्ट है कि यदि किसी कुण्डली में राहु षष्ठ स्थान में, शनि की राशि में स्थित हो तो शनि तीन प्रकार से रोग देने वाला बन जाएगा-

  1. रोग कारक होने से,
  2. रोग स्थान का स्वामी होने से,
  3. राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से।

ऐसा शनि जिस भाव में स्थित होगा अथवा जिस भाव पर दृष्टि डालेगा उसमें रोग की उत्पत्ति कर देगा।

उदाहरणार्थ कन्या लग्न हो और राहु छठे स्थान में हो तो शनि उपर्युक्त तीनों प्रकार से रोगदायक होगा। यह शनि यदि नवम स्थान में पड़ जाए तो रीढ़ की हड्डी, नितम्ब आदि नवम स्थान प्रदर्शित शरीर के अंगों में दोष तथा रोग उत्पन्न करेगा । अपनी तृतीय स्थान तथा एकादश स्थान पर दृष्टि के कारण कान के रोग भी ला खड़े करेगा । छठे स्थान पर दृष्टि के कारण अन्तड़ियों को भी निर्बल बनाएगा ।

7. कर्ज अथवा ऋण – कर्ज अथवा ऋण भी हम दूसरों से अन्यों से लेते हैं, अपनों से नहीं; क्योंकि अपने देकर लेते नहीं । अतः ऋण का सम्बन्ध भी छठे स्थान से है।

जब लग्न, द्वितीय तथा द्वादश पाप प्रभाव में हों और षष्ठेश का सम्बन्ध दूसरे भाव तथा उसके स्वामी से हो तो मनुष्य की आय कम, व्यय ज्यादा होकर, ऋण की उत्पत्ति होती है।

8. पत्नी का सुन्दर होना – उस पुरुष को सुन्दर पत्नी प्राप्त होती है जिसके सप्तम भाव में सम (Even) राशि हो, सप्तमेश भी सम राशि में हो और सप्तम का कारक शुक्र भी सम राशि में हो तथा सप्तमेश एवं अष्टमेश शुभ एवं बलवान् हों ।

जब स्त्री की कुण्डली में उसके लग्न तथा चन्द्र लग्न सम (Even) राशि में होते हैं तथा शुभ दृष्ट हों तो वह स्त्री सुन्दर भी होती है और अच्छे स्वभाव वाली, धनी और गुणवती भी ।

9. दशम भाव – यदि दशम भाव, दशमेश तथा सूर्य सभी पर शनि, राहु, द्वादशेश आदि पृथकताजनक ग्रहों का प्रभाव हो तो मनुष्य चाहे राजा के घर भी उत्पन्न हो, उसे राज्य से हाथ धोना पड़ेगा।

कुम्भ लग्न में दशम में वृश्चिक राशि में स्थित हुआ शनि बहुत शुभ समझना चाहिए, यद्यपि वह शत्रु राशि में स्थित है। कारण यह है कि शनि लग्नेश है और उसको दो अच्छे बल प्राप्त हो रहे हैं। एक तो प्रमुख केन्द्र (दशम भाव) में स्थित होना और दूसरे शनि का अपनी राशि मकर को देखना। इस दृष्टि के फलस्वरूप लग्न को भी बहुत बल मिलता है।

इसीलिए चन्द्रकला नाड़ी के लेखकों का कहना है कि- “यदि कुम्भ लग्न हो, गदांश हो, लग्नेश शनि दशम भाव में स्थित हो तो मनुष्य जन्म से ही धनवान् होता है और कभी भी गरीबी नहीं देखता ।“

कुंडली में चंद्र का प्रभाव

1. जिन जातकों की जन्मकुंडलियों में चंद्रमा शुभ, दुष्प्रभावों से मुक्त और बली होकर बैठा होता है, उनमें दिमाग से अधिक दिल से काम लेने की प्रवृत्ति स्पष्ट झलकती है। वे सरल, विनम्र, निष्छल होते हैं। वे दिमाग के बजाए आत्मा की आवाज ही अधिक सुनते हैं। ऐसा व्यक्ति बहुत गहरा ध्यान लगा सकता है।

2. चंद्रमा कर्क राशि का प्रतिनिधित्व करता है। कर्क राशि में पाप ग्रह हो, तो चंद्रमा स्वयं पापी हो जाता है। खासकर राहु का कर्क में स्थित होना चंद्रमा के बल को नष्ट करता है। इस स्थिति में चंद्रमा जिस भाव में स्थित होगा, उसकी हानि करेगा ।

3. चंद्र और राहु यदि कुंडली के एक ही भाव में बैठे हों तो जातक को अत्यधिक उद्दंड प्रकृति का बना देते हैं। ऐसा व्यक्ति मानसिक द्वंद का शिकार रहता है लेकिन यह योग विदेश यात्राओं/विदेश प्रवास तथा धन-समृद्धि के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। राहु विजातीय तत्व का और चंद्र यात्राओं का प्रतिनिधि होता है। यदि नौवें या 12वें भाव में यह योग बैठे तो बहुत प्रभावशाली हो जाता है।

यदि चंद्र और राहु दोनों ही कुंडली में बली हों तो जातक को कूटनीतिक बुद्धि का स्वामी बना देते हैं वह दूसरों की कमजोरियां झट से भांप जाता है। लेकिन यदि चंद्र इस योग में कमजोर हो तो जातक मंदबुद्धि, अतिअम्लीयता का शिकार, धूर्त अथवा मानसिक रोगी हो सकता है।

4. यदि चंद्र व केतु एक-दूसरे के साथ कुंडली में बैठे हों तो जातक में दूसरों के मन की बात जान लेने की दुर्लभ शक्ति आ जाती है। वह जातक ज्ञान और अध्यात्म में गहरी रुचि लेता है। वह दार्शनिकों जैसी बातें करता है।

5. यदि पूर्ण चंद्र पर किसी ऐसे ग्रह की दृष्टि हो जो अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि या उच्च राशि में बैठा हो तो ऐसे ग्रह योग वाला जातक निर्धन परिवार तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में जन्म लेकर भी शासक या उसके समतुल्य हैसियत को प्राप्त कर लेता है।

कुंडली की शक्ति का मूल आधार चंद्र का बल ही होता है। चंद्र बली होकर स्थित हो तो उस कुंडली से संबद्ध जातक भी मानसिक रूप से बली व शक्तिशाली होता है।

6. धनु लग्न वाले जातकों की कुंडलियों में यह दुःस्थान आठवें भाव का स्वामी होने के बावजूद लग्नेश बृहस्पति का मित्र होने के नाते शुभ फल देता है। वस्तुतः इस लग्न वाले जातकों में चंद्र का मंगल, बृहस्पति या सूर्य के साथ संबंध भी अक्सर अच्छे फल देता देखा गया है।

7. ‘सारावली’ में कहा गया है कि राजकुल में जन्म लेने वाले जातकों को छोड़कर अन्य जातकों में ‘राजयोग’ की संभावना निश्चित करने के लिए चंद्र पर शुभ ग्रहों का अनुकूल संगतिकारक या दृष्टिकारक प्रभाव भी अनिवार्य है।

‘फलदीपिका’ में भी इसी मत की पुष्टि की गई है “यदि चंद्र पूर्ण हो और चौथे, सातवें या दसवें भाव में बैठा हो और उस पर स्वराशि या उच्च की राशि में बैठे किसी प्राकृतिक शुभ ग्रह की दृष्टि अथवा संगति का प्रभाव हो तो निम्न कुल में जन्म लेने वाला एक व्याध (शिकार करके जीवन-यापन करने वाला) भी राजा बन सकता है।“

8. चन्द्र के सम्बन्ध में एक और बात याद रखने की यह है कि चन्द्र सूर्य के समीप होता हुआ भी बलवान् समझा जाएगा यदि सूर्य स्वयं निर्बल हो।

जैसे सूर्य तुला राशि के चतुर्थ स्थान में हो और चन्द्र वृश्चिक राशि द्वितीय तिथि का पंचम भाव में तो भी चन्द्र बलवान समझा जाएगा। क्योंकि यहां सूर्य स्वयं तुला राशि में भी निर्बल है और चतुर्थ केन्द्र में भी दिक् बल को खोकर निर्बल है।

कुंडली में मंगल का प्रभाव

1. यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में मंगल वक्री होकर स्थित हो तो वह जातक को एक पल भी चैन और खुशी से जीने देना नहीं चाहता। विशेषकर वक्री मंगल पूरी वक्रता विंशोत्तरी दशा – अंतरदशा की अवधि में दिखाता है।

2. ‘जातक पारिजात’ में कहा गया है – “यदि मंगल कुंडली में उच्च का होकर या स्वराशि में होकर सूर्य, चंद्र और बृहस्पति की दृष्टि में या उनके साथ बैठा हो तो निम्न और निर्धन कुल में जन्म लेने वाला जातक भी पूरी पृथ्वी का रक्षक, सार्वभौम सम्राट बन सकता है।“

3. मंगल चतुर्थ स्थान में दिक् बल से शून्य अतः निर्बल होता है, अतः यदि मेष लग्न वालों को चतुर्थ स्थान में पड़ जाए और शुभदृष्ट न हो तो अल्पायु कर देता है।

4. लग्न में नीच राशि का मंगल अच्छा माना गया है, क्योंकि कर्क लग्न वालों के लिए यह ग्रह योगकारक होता हुआ अपनी एक राशि मेष से चतुर्थ (शुभ स्थान) तथा दूसरी राशि वृश्चिक से नवम पुनः शुभ स्थान में पड़ता है ।

5. कर्क लग्न वालों के लिए उच्च राशि का मंगल सप्तम स्थान में काहल योग बनाता है जो एक उत्तम राजयोग है। कारण, मंगल राजयोग कारक भी बन जाता है, केन्द्र में भी स्थित होता है, उच्च भी होता है तथा निज राशि मेष को भी देखता है ।

6. मिथुन लग्न का मंगल – यहॉ मंगल षष्ठाधिपति तथा एकादशाधिपति बन जाता है। एक तो मंगल हिंसाप्रिय है, फिर हिंसा स्थान (छठे) का स्वामी है, पुनश्च एकादश स्थान भी छठे से छठा होने के कारण हिंसात्मक ही है; अतः मंगल में बहुत हिंसा का समावेश हो जाता है। यदि केतु भी षष्ठ अथवा एकादश स्थान में पड़ा हो तो मंगल उग्रतम रूप में हिंसात्मक बन जाता है।

स्पष्ट है कि जितना-जितना अधिक इस मंगल का प्रभाव लग्नादि पर पड़ेगा, मनुष्य उतना उतना अधिक हिंसाप्रिय होता चला जाएगा। यदि इसका प्रभाव लग्न तथा चन्द्र पर हो जाए और मंगल शुभ प्रभाव में न हो तो मनुष्य बहुत हिंसाप्रिय, क्रूरकर्मों का करने वाला होता है।

यदि ऐसा मंगल लग्न में (मिथुन राशि में) हो और चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो मनुष्य घातक (Murderer), लुटेरा आदि होता है।

कुंडली में बुध का प्रभाव

1. बुध ही सात्विक ग्रहों में एक मात्र ऐसा ग्रह भी है जो कि मृत्यु स्थान समझे जाने वाले 8वें भाव में बैठकर भी शुभ फल देने में पूर्ण समर्थ होता है।

2. बुध का आचरण मानव मन की तरह होता है जिस प्रकार यदि कोई मनुष्य सत्संगति में बैठकर सज्जन और कुसंगति में बैठकर दुर्जन बन जाता है। उसी प्रकार बुध शुभ ग्रहों के साथ अथवा उनकी दृष्टि में स्थित हो तो शुभ ग्रह की भांति और अशुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो अशुभ ग्रह की भांति आचरण करता है। यदि कुंडली में बुध अकेला और दग्धतामुक्त होकर बैठा हो तो शुभ ग्रह कहलाता है ।

3. बुध एक नपुंसक ग्रह है। जब यह एक दूसरे नपुंसक ग्रह शनि से मिलकर सप्तम भाव, सप्तम भाव के स्वामी तथा शुक्र इन सब पर अपना प्रभाव डालता है और उन तीनों वीर्य द्योतक अंगों पर इन दो के अतिरिक्त और कोई प्रभाव नहीं होता है तो मनुष्य नपुंसक होता है।

कुंडली में बृहस्पति का प्रभाव

यदि बृहस्पति कुंडली में बलहीन और दुष्प्रभावित होकर बैठा हो तो संबंधित जातक के लिए अभिशाप होता है। ऐसी स्थिति में जातक मानवीय और धार्मिक भावनाओं से वंचित हो जाता है और उसकी अंतरात्मा गूंगी हो जाती है। उसके विचार कुमार्गी हो जाते हैं और वह ‘काम निकलना चाहिए, चाहे जिस तरीके से भी निकले’ की उक्ति का कायल, स्वार्थी, आत्मकेंद्रित और धन-लोलुप बन जाता है। ऐसा व्यक्ति आत्म-नियंत्रण खो बैठता है। वह निर्दयता, दिखावे, खर्चीलेपन की प्रवृत्ति रखता है।

वह झूठी आशाओं में जीता है और सस्ती लोकप्रियता पाने का इच्छुक होता है। वह संकीर्ण मानसिकता का और अत्यधिक आशावादिता का भी शिकार होता है। वह ढोंगी होता है और धर्म का दिखावा करता है। ऐसा व्यक्ति जान-बूझकर पाप करने का शौकीन होता है। वह अपनी वासना का गुलाम भी होता है। उसे कभी भी अपनी करतूतों पर पछतावा नहीं होता । ऐसे व्यक्ति को बच्चे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते। सामाजिक रूप से वह गैर जिम्मेदार और पहले सिरे का बेशर्म होता है। उसे समाज पर बोझ समझा जा सकता है।

बृहस्पति को कर्क, धनु, मीन राशियों तथा केंद्र (1, 4, 9, 10) या त्रिकोण (5, 9) भावों में स्थित होने पर शुभ फल देने वाला और योगकारक कहा गया है। यदि उक्त स्थितियों में वह चंद्र या शुक्र या दोनों के साथ हो अथवा उनकी शुभ दृष्टि में हो तो अत्यंत प्रभावशाली योग देता है लेकिन उक्त स्थितियों में वह राहु के साथ या उसकी दृष्टि में हो तो योग निरस्त हो जाता है।

यदि बृहस्पति कमजोर और दुष्प्रभावित होने के साथ-साथ छठवें भाव, उसके स्वामी ग्रह, उसके कारक ग्रह शनि या मंगल, राहु अथवा केतु से उसका संबंध हो तो जातक को शारीरिक कष्टों की प्रबल संभावना होती है और यदि बृहस्पति का उक्त स्थिति में होने के साथ-साथ लग्न से भी संबंध हो तो निश्चित ही समझना चाहिए कि ऐसा बृहस्पति अपनी दशा-अंतर के दौरान जातक को शारीरिक कष्ट देगा।

यदि लग्नेश या लग्न भाव के कारक सूर्य या चंद्र से भी लग्न के साथ-साथ ऐसे बृहस्पति का संबंध जुड़ता हो तो पक्का है कि जातक रोगी होगा।

कुंडली में शुक्र का प्रभाव

1. किसी महिला की कुंडली के लग्न भाव में स्थित शुक्र पर यदि सूर्य, मंगल, यूरेनस, राहु आदि अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो वह अभिभावकों की रातों की नींद उड़ा सकती है। वह गुप्त विवाह कर सकती है और अपने प्रेमी के साथ घर से भाग भी सकती है।

यदि बुध, चंद्र आदि शुभ ग्रहों का संगति या दृष्टि प्रभाव लग्न में स्थित शुक्र पर हो तो वह महिला चंचल वृत्ति की तो होती है लेकिन समझदार भी होती है।

2. यदि किसी महिला की कुंडली में शुक्र 12वें भाव में बैठा हो तो उसकी शादी जल्दी कर देना ही ठीक रहता है। यदि इस भाव में बैठा शुक्र शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो महिला सुंदर और अपने पति की जरुरतों का पूरा-पूरा ध्यान रखने वाली होती है।

3. यदि शुक्र सप्तम भाव के स्वामी ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक अत्यधिक रोमांसप्रिय होता है।

4. सातवें भाव का स्वामी यदि शुक्र ही हो और वह अपनी नीच की राशि में अथवा सूर्य की समीपता से दग्ध होकर अथवा अशुभ ग्रहों की संगति या दृष्टि से दुष्प्रभावित होकर कुंडली में बैठा हो तो जातक (पुरुष) को हृदयहीन, अमर्यादित और ठग प्रवृत्ति की पत्नी देता है।

लेकिन यदि वह सातवें भाव का स्वामी होकर शुभ नवांश में या मित्र ग्रह के नवांश में या उच्च नवांश में बैठा हो, शुभ ग्रहों का उस पर प्रभाव हो अथवा वह अपनी ही राशि में बैठा हो तो जातक की पत्नी गुणवंती, सहृदय और बतरसिया होती है ।

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5. यदि शुक्र और बृहस्पति एक साथ हों अथवा शुक्र पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो जातक (पुरुष) को पत्नी सुंदर और गुणवती मिलती है यदि शुक्र के साथ कोई अशुभ ग्रह हो या अशुभ ग्रह उस पर दृष्टि रखता हो तो जातक की पत्नी न तो सुंदर होगी न गुणवती।

6. शुक्र एक विलासप्रिय ग्रह है। जब एक विलास भाव का स्वामी होकर दूसरे विलास भाव में स्थित होता है तो मनुष्य को विलासी तथा लम्पट बनाता है। जैसे सप्तम भाव में वृषभ का अथवा द्वादश भाव में तुला राशि का ।

7. शुक्र मुख का कारक है। जब मुख स्थान का स्वामी होकर शुभ प्रभाव में हो तो मनुष्य को सुन्दर बनाता है ।

कुंडली में शनि का प्रभाव

1. शनि जब सूर्य से 25° दूरी पर होता है तो वक्री हो जाता है और सूर्य से 109° अंश दूर रह जाने तक वक्री ही रहता है। यह अवधि लगभग 140 दिन की होती है। शनि की वक्रता हमेशा ही जातकों के लिए कष्टकर होती है। विशेषकर उन जातकों को तो शनि के वक्री होने से पहले अत्यधिक कष्ट होता है जिन पर उस समय शनि की महादशा अथवा अंतरदशा चल रही हो।

2. शनि का रंग काला है । यदि शनि तथा राहु लग्न, लग्नेश चन्द्र लग्न, चन्द्र लग्नेश, सूर्य लग्न, सूर्य लग्नेश तथा द्वितीयेश पर प्रभाव डालें तो मनुष्य के शरीर का रंग काला होता है ।

3. शनि की पृथकताजनक प्रवृत्ति का एक फल यह भी है कि शनि जब चन्द्र पर दृष्टि द्वारा प्रभाव डालता है तो मन को वैराग्यमय बना देता है और सांसारिक विषयों से विरक्त कर देता है।

शनि की साढे साती

1. गोचर में शनि के चंद्र से 45o के अन्दर आने पर शनि की साढे साती शुरु होती है और 45o आगे जाने पर समाप्त होती है.

शनि की साढे साती का फलादेश

2. जिसकी चंद्र कुंडली में शनि यॉ चंद्रमा त्रिकोण के स्वामी हों उसके उपर साढे साती का प्रभाव नगण्य होता है. इसलिए साढे साती का

  • 1, 5, 9 राशि पर सबसे अधिक दुष्प्रभाव होता है.
  • 2,7, 3,6, 10,11 राशि पर बहुत कम दुष्प्रभाव होता है.
  • 4, 8, 12 राशि कोई दुष्प्रभाव नहीं होता.

3. जिन लोगों की कुण्डलियों में शनि बलवान, उच्च, स्वगृही, मित्रगृही, या योग कारक होता है, उन लोगों को शनि की साढ़े साती में विशेष कष्ट नहीं होता। इसके विपरीत निर्बल और शत्रु क्षेत्री शनि वाली कुण्डलियों में शनि जातकों के लिए इस अवधि में विशेष अनिष्टकारी रहता है ।

4. गोचर में शनि के चंद्र से चतुर्थ यॉ अष्टम भाव में आए तो शनि की ढैय्या होती है. इस ढाई वर्ष की अविधि में भी शनि कष्ट देता है लेकिन इसमें भी उपरोक्त नियम लागू होते हैं.

अष्टक वर्ग

कुंडली में अष्टक वर्ग का फलादेश ज्योतिष विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है। अष्टक वर्ग एक ऐसी प्रणाली है जो जन्म कुंडली के विभिन्न भावों में ग्रहों की स्थिति और उनके योगदान का विश्लेषण करती है। यह प्रणाली जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ग्रहों के प्रभाव का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है।

अष्टक वर्ग का उपयोग करके फलादेश करने के लिए सबसे पहले अष्टक वर्ग तालिका बनाई जाती है। यह तालिका प्रत्येक ग्रह के आठ अलग-अलग वर्गों में विभाजित अंक प्रस्तुत करती है। ये आठ वर्ग होते हैं: लग्न, चंद्र, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शनि। इन आठ वर्गों के अंकों को जोड़कर कुल अंक प्राप्त किए जाते हैं, जो उस ग्रह का कुल प्रभाव दर्शाते हैं।

1. अष्टक वर्ग के कुल अंक 337 होते है और कुंडली में भाव 12 होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक भाव के 337/12 = 28 औसत अंक होते हैं।

2. प्रत्येक ग्रह प्रत्येक भाव में अधिकतम 8 अंक दे सकता है।

3. अष्टक वर्ग में शुभ भावों पर अधिक अंको का होना श्रेष्ठ माना गया है।

4. अष्टक वर्ग में 6,8,12 भाव में जितना कम अंक होंगे उतना ही अच्छा माना गया है। यहां पर अधिक अंक होने से जीवन ज्यादा कष्टकारी हो जाता है।

5. अष्टक वर्ग में 1,2,4,5,9,10,11 भावों पर 24 से कम अंक हो तो इन भावों से संबंधित फल अत्यंत कम मिलेगा ।

6. अष्टक वर्ग में चतुर्थ भाव को यदि 30 से ज्यादा अंक प्राप्त हो साथ में द्वितीय तथा लग्न को भी 30 से ज्यादा अंक प्राप्त हो तो इसको अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक खुद से मजबूत, सुख को भोगने वाला तथा उसको सुखों की कमी कभी नहीं रहेगी।

7. अष्टक वर्ग में यदि लग्न नवम, दशम तथा एकादश भाव को 30 से अधिक अंक प्राप्त हो तो इसको अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक हमेशा तरक्की करने वाला, इच्छा पूर्ति करने वाला तथा उसका जीवन अत्यंत सुखमय में कहा गया है।

8. यदि अष्टक वर्ग में नवम भाव को 28 से ज्यादा अंक प्राप्त हो तो ऐसे जातक का भाग्य हमेशा साथ देगा तथा इससे अधिक होने पर जातक का भाग्य हमेशा बलवान रहेगा तथा भाग्य के लिए श्रेष्ठ कहा गया है।

9. यदि अष्टक वर्ग में दशम भाव में 36 या अधिक शुभ बिंदु हों और उस पर कोई पाप ग्रह न हो और न ही किसी पाप ग्रह से दृष्टि हो, तो जातक स्व-निर्मित (self made man) होता है।

10. यदि दशम भाव से ज्यादा अंक द्वितीय तथा एकादश भाव में होंगे तो यह अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक के पास धन हमेशा बना रहेगा, जितना करेगा उससे ज्यादा प्राप्त होगा तथा संघर्ष ज्यादा नहीं करनी पड़ेगा।

10. यदि अष्टक वर्ग में 12वे भाव के अंक लग्न तथा एकादश भाव से ज्यादा होंगे तो भी इसको अच्छा नहीं माना गया है ऐसा जातक कभी धन संचय नहीं कर पाएगा साथ में उसका खर्च में कभी नियंत्रण नहीं रहेगा।

11. यदि अष्टक वर्ग में चंद्र राशि पर 30 से अधिक अंक हो तो जातक एक सुखी वैवाहिक जीवन जीता है और यदि उसमें 25 या 25 से कम अंक हों तो उसका वैवाहिक जीवन दुख भरा हो सकता है।

12. वे ग्रह जो उन भावों में स्थित हैं जिन्हें अष्टक वर्ग में अधिक अंक मिले हैं, शुभ फल करते हैं।

 अष्टक वर्ग से वर-वधू का चुनाव

अष्टक वर्ग का प्रयोग वर और वधू के चुनने में भी सहायक है। यदि वर की जन्म कुण्डली में जन्म राशि एक ऐसी राशि हो जिसको वधू की जन्म कुण्डली में सबसे अधिक अंक प्राप्त होते हों तो विवाह के अनन्तर सुख समृद्धि रहेगी।

इसी प्रकार यदि वधू की जन्मकुण्डली में उसकी जन्म राशि ऐसी राशि बनती हो कि उसे वर की कुण्डली में सबसे अधिक अंक अष्टक वर्ग में प्राप्त होते हैं तो भी विवाह के अनन्तर वर-वधू सुखी और समृद्ध रहेंगे ।                                     

अष्टक वर्ग से गोचर फलित

  • प्रत्येक ग्रह प्रत्येक राशि में अधिकतम 8 अंक दे सकता है ।
  • यदि आठ अंकों में से चार की प्राप्ति हो तो फल मिश्रित होता है। चार से जितने कम अंक मिलेंगे फल उतना उतना अनिष्टकारी होता चला जायेगा।
  • यदि किसी राशि को कोई भी अंक न मिले तो उस राशि में गोचर आदि फल अत्यन्त अनिष्टकारी होता है।
  • उधर चार से ऊपर पांच अंक मिलें तो फल अच्छा होता है । 6 अंक मिलें तो बहुत अच्छा, 7 अंक मिलें तो उत्तम फल और यदि आठ के आठ अंक मिल जायें, तो सर्वोत्तम फल कहना चाहिये ।
  • गोचर (transits) के समय जब कोई ग्रह उच्च अंक वाली राशि से गुजरता है, तो वह सर्वोत्तम फल देता है।

कुंडली से राजनीति का विचार

कुंडली से राजनीति का विचार करने के लिए सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शनि जैसे ग्रहों की स्थिति देखी जाती है, खासकर दशम भाव (कर्म स्थान), लग्न, चतुर्थ (जनता) और नवम (भाग्य) भाव में, जहाँ राजयोग, सूर्य का बली होना, और राहु-शनि की अनुकूल स्थिति उच्च पद और नेतृत्व क्षमता दर्शाती है, जो सत्ता, जनसमर्थन और नीतियों के संतुलन को दिखाती है।

राजनीति में सफलता के लिए महत्वपूर्ण भाव और ग्रह:

  • सूर्य (Sun): सरकार, राजा और सत्ता का कारक, लग्न, चतुर्थ, नवम या दशम भाव में बली हो तो सफलता मिलती है।
  • मंगल (Mars): साहस, नेतृत्व और शासन शक्ति देता है; दशम भाव (दशमेश) से संबंध शुभ होता है।
  • बुध (Mercury): वाणी, बुद्धि और संचार का कारक, अच्छा वक्ता बनाता है; दशम भाव से संबंध महत्वपूर्ण है।
  • गुरु (Jupiter): ज्ञान, नीति और परोपकार का प्रतीक; उच्च का गुरु या दशम भाव से संबंध कुशल नेतृत्व देता है।
  • शनि (Saturn): न्याय, लोक-कल्याण और स्थायित्व; दशम भाव या दशमेश से संबंध लंबे समय तक राजनीति में बनाए रखता है।
  • राहु (Rahu): जनमानस को प्रभावित करने और अप्रत्याशित सफलता के लिए महत्वपूर्ण; दशम या एकादश भाव में शुभ ग्रहों के साथ हो तो जनता में पकड़ बनती है।

प्रमुख योग (Combinations):

  • दशम भाव: दशमेश (दशम भाव का स्वामी) का बलवान होना, दशम भाव में उच्च के ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि) या शुभ ग्रहों का होना।
  • राजयोग: केंद्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (1, 5, 9) भावों के स्वामी का संबंध।
  • लोकसभा योग: चतुर्थ (जनता), नवम (भाग्य), दशम (कर्म) और एकादश (लाभ) भावों का प्रबल होना।
  • विरासत में राजनीति: लग्न, धन भाव (दूसरा), दशम और एकादश भाव में ग्रहों की विशेष स्थिति (जैसे सिंह लग्न में सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु का धन भाव में होना)।

भावों का महत्व:

  • प्रथम भाव (लग्न): व्यक्तित्व और जनता को आकर्षित करने की क्षमता।
  • चतुर्थ भाव: जनता का प्रतिनिधित्व, जनसमर्थन।
  • दशम भाव: कर्म, पद, सत्ता और नेतृत्व।
  • नवम भाव: भाग्य, धर्म और आदर्श।
  • एकादश भाव: लाभ, समर्थक और वोट बैंक।

निष्कर्ष: कुंडली में इन ग्रहों और भावों का शुभ संयोग व्यक्ति को राजनीति में उच्च स्थान दिला सकता है, लेकिन अंततः व्यक्ति का धैर्य, दृढ़ संकल्प और ग्रहों की ऊर्जा का सही उपयोग ही राजनीतिक भाग्य को आकार देता है।

कुंडली से जेल यात्रा का विचार

कुंडली से जेल यात्रा का विचार ग्रहों की अशुभ स्थिति, खासकर शनि, मंगल, और राहु के प्रभाव से बनता है, जो 6वें (रोग, शत्रु), 8वें (अचानक संकट) और 12वें (कारावास, एकांत) भावों से संबंधित होते हैं; इन भावों में इन ग्रहों की युति या दृष्टि से ‘बंधन योग’ बनता है, जो कोर्ट-कचहरी, मुकदमे या जेल जाने की स्थिति पैदा कर सकता है, लेकिन शुभ ग्रहों के प्रभाव से इसके अशुभ फल कम हो सकते हैं।

जेल योग के मुख्य ज्योतिषीय कारक (ग्रह और भाव):

मुख्य ग्रह (Key Planets): शनि (न्याय, सज़ा), मंगल (क्रोध, हिंसा, मुकदमे), राहु (विद्रोह, झूठे आरोप, जेल), और केतु।

मुख्य भाव (Key Houses):

  • 6वां भाव: मुकदमा, शत्रु, विवाद।
  • 8वां भाव: अचानक संकट, कारावास, दंड।
  • 12वां भाव: एकांत, कारावास, हानि, विदेश।

प्रमुख योग (Combinations):

  • 6वें, 8वें या 12वें भाव में पाप ग्रहों (शनि, मंगल, राहु) की युति या दृष्टि।
  • शनि और मंगल का राहु के साथ युति करना, खासकर 12वें भाव में।
  • लग्न या 12वें भाव का राहु अपराध से जेल दे सकता है।
  • 6वें या 8वें भाव के स्वामी का 12वें भाव के स्वामी से संबंध बनना।

विभिन्न परिस्थितियाँ (Situations):

  • कोर्ट-कचहरी/मुकदमा: 6, 8, 12 भावों में ग्रहों की स्थिति और दशा।
  • अपराध के कारण जेल: मंगल और राहु की युति या 12वें भाव में इनकी स्थिति।
  • अशुभ दशा/अंतर्दशा: जब पाप ग्रहों की दशा-अंतर्दशा चल रही हो और कुंडली में ये योग बन रहे हों।

निवारण (Remedies):

यदि ये योग बनते हैं, तो अशुभ ग्रहों के मंत्र जाप, दान और वैदिक उपायों से इनके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है। कुछ मामलों में, ज्योतिषी ‘बंधन योग’ को तोड़ने के लिए जेल में रात बिताने जैसे उपाय भी सुझाते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

कुंडली में जेल यात्रा का योग केवल ग्रहों और भावों के संबंध से बनता है, लेकिन यह निश्चित नहीं होता; दशा-महादशा और शुभ ग्रहों के प्रभाव से इसके फल बदल सकते हैं, और कभी-कभी अच्छे व्यक्ति को भी परिस्थितिवश जेल जाना पड़ सकता है।

कुंडली में शेयर बाजार के योग

कुंडली में शेयर बाजार से लाभ के लिए पंचम भाव (निवेश/बुद्धि), एकादश भाव (लाभ), और धन भाव (दूसरा भाव) का मजबूत होना, तथा बुध (व्यापार), बृहस्पति (धन/लाभ), राहु (अचानक लाभ/सट्टा) और चंद्रमा (मन/जोखिम) जैसे ग्रहों की शुभ स्थिति महत्वपूर्ण है; खासकर राहु-बृहस्पति की अच्छी युति या पंचमेश का शुभ होना शेयर बाजार में सफलता दिला सकता है, जबकि सूर्य-राहु, चंद्र-राहु या गुरु-राहु की युति या धन भाव में राहु नुकसान का संकेत देती है.

शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण भाव (Houses):

  • पंचम भाव (5th House): सट्टा, निवेश, बुद्धि और अचानक लाभ का भाव, इसकी मजबूती आवश्यक है.
  • एकादश भाव (11th House): आय, लाभ और इच्छापूर्ति का भाव.
  • धन भाव (2nd House): संचित धन और आर्थिक स्थिति.
  • अष्टम भाव (8th House): अचानक धन प्राप्ति या रुकावटें.

शेयर बाजार से जुड़े मुख्य ग्रह (Planets):

  • बुध (Mercury): व्यापार, वित्त, और विश्लेषण का कारक; कुंडली में मजबूत बुध शेयर बाजार में सफलता दिलाता है, विशेषकर सलाहकार के रूप में.
  • बृहस्पति (Jupiter): धन, विस्तार और भाग्य का कारक; मजबूत बृहस्पति कमोडिटी मार्केट (सोना, चांदी) में लाभ देता है.
  • राहु (Rahu): अचानक लाभ, अटकलें और जोखिम का कारक; अनुकूल होने पर बड़ी सफलता देता है, लेकिन प्रतिकूल स्थिति में नुकसान.
  • चंद्रमा (Moon): मन और भावनाओं का कारक; राहु के साथ चंद्र की स्थिति शेयर बाजार में अस्थिरता और हानि बढ़ा सकती है.

सफलता के योग (Favorable Combinations):

  • बुध-गुरु की युति: व्यापार और निवेश में बड़ी सफलता.
  • पंचमेश (5th Lord) का मजबूत होना: पंचम भाव में स्वराशि/उच्च राशि में या शुभ ग्रहों से दृष्ट होना.
  • राहु-बृहस्पति का केंद्र या त्रिकोण में होना: शेयर बाजार में निवेश और लाभ.
  • शुक्र-राहु की युति: लॉटरी या सट्टे में बड़ी राशि दिला सकती है.

नुकसान से बचने के योग (Unfavorable Combinations):

  • सूर्य-राहु, चंद्र-राहु, या गुरु-राहु की युति: इन स्थितियों में शेयर बाजार से दूर रहना चाहिए, क्योंकि वित्तीय अस्थिरता आती है.
  • धन भाव में राहु: शुरुआत में लाभ, फिर बर्बादी की संभावना.
  • केंद्र में राहु: बहुत तरक्की के बाद आर्थिक स्थिति खराब होना.

निष्कर्ष: शेयर बाजार में सफलता के लिए पंचम भाव, एकादश भाव और बुध, गुरु, राहु, चंद्रमा जैसे ग्रहों की स्थिति महत्वपूर्ण है; ग्रहों की दशा और गोचर का प्रभाव भी देखा जाता है. हालांकि, सूर्य-राहु या चंद्र-राहु जैसे योग नुकसान का संकेत देते हैं.

कुंडली से दुर्घटना कैसे जाने

कुंडली में दुर्घटना जानने के लिए मुख्य रूप से मंगल, शनि, राहु, केतु जैसे क्रूर ग्रहों और अष्टम, द्वादश, छठे, लग्न भावों पर ध्यान दिया जाता है, खासकर जब ये भाव या स्वामी अशुभ ग्रहों से पीड़ित हों, या दशा-अंतर्दशा में ये स्थितियाँ बनें, तब अचानक चोट, वाहन दुर्घटना या गंभीर समस्या की आशंका होती है, जिसमें चंद्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। दुर्घटना योग के प्रमुख ज्योतिषीय संकेत:

ग्रहों का संबंध:

  • मंगल और राहु/केतु: अष्टम भाव में इनकी युति या संबंध रक्तपात, वाहन दुर्घटना या गंभीर चोट दे सकता है।
  • शनि और राहु/केतु: द्वादश भाव में संबंध गंभीर दुर्घटना और अस्पताल में भर्ती होने का संकेत देता है।
  • चंद्र और राहु/केतु: मानसिक भ्रम के साथ दुर्घटना संभव है।
  • मंगल और शनि: एक साथ होना या संबंध बनाना दुर्घटना योग बनाता है, खासकर लग्न या धन भाव से संबंध होने पर।

भावों का प्रभाव (Houses):

  • अष्टम भाव (8th House): अचानक मृत्यु, गंभीर चोट, ऑपरेशन, या मृत्युतुल्य कष्ट का कारक।
  • द्वादश भाव (12th House): अस्पताल, कारावास, शरीर के अंगों को नुकसान (Amputation) या दुर्घटना का घर।
  • लग्न (Ascendant/1st House): शरीर और जीवन का भाव; लग्न या लग्नेश पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव चोट देता है।
  • छठा भाव (6th House): रोग, शत्रु और दुर्घटना का भाव; इसका स्वामी अशुभ हो तो खतरा।

दशा और गोचर:

  • मारक दशा: मारक ग्रहों (जैसे लग्नेश या अष्टमेश) की दशा या अंतर्दशा में दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
  • क्रूर ग्रहों का गोचर: जब शनि, मंगल, राहु, केतु जैसे ग्रह अष्टम या द्वादश भाव से गोचर करते हैं, तो दुर्घटना की संभावना होती है, खासकर जब यह दशा से समर्थित हो।

विशेष योग:

  • अंगारक योग (मंगल-राहु): उग्र स्वभाव और जोखिम लेने की प्रवृत्ति के साथ दुर्घटना का योग।
  • लग्न/अष्टम भाव के स्वामी: यदि ये स्वामी किसी अशुभ ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु) के साथ हों या पीड़ित हों।

सावधानियां और उपाय (Remedies):

  • ग्रह शांति: मंगल और राहु के लिए हनुमान चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें, शनि के लिए तिल का दान करें।
  • वाहन चलाते समय: मंगल-राहु के प्रभाव में वाहन तेज न चलाएं, सतर्क रहें।

फलित रत्नाकर

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